मुनफ नहीं होते तो शायद ही टीम इंडिया तक पहुंच पाते श्रीसंत, ऐसे समय में की मदद, जब नहीं थे पैसे

नई दिल्‍ली : एक जमाने में अपनी तेजी से विपक्षी बल्‍लेबाजों में खौफ भर देने वाले मुनफ पटेल ने आज क्रिकेट के सभी फॉर्मेट से संन्‍यास ले लिया। वह 2011 की विश्‍व कप विजेता टीम के प्रमुख सदस्‍य थे और भारत को चैम्पिन बनाने में उन्‍होंने प्रमुख भूमिका निभाई थी। लेकिन क्रिकेट की दुनिया में उनका आना भी आसान नहीं था। इससे पहले वह दिहाड़ी मजदूर थे। वह टाइल के डिब्‍बों की पैकिंग किया करते थे और यह काम 8 घंटे करने पर उन्‍हें दिनभर की मजदूरी महज 35 रुपए मिलते थे। यह गरीबी का दर्द जानते थे, इसलिए उन्‍होंने हर जरूरतमंद की मदद की। एक वक्‍त तो ऐसा आया कि क्रिकेटर श्रीसंत के पास किराया देने के लिए भी पैसे नहीं थे, तब यह खिलाड़ी उनकी मदद को आगे आया। जिस वजह से श्रीसंत बाद में अंतरराष्‍ट्रीय क्रिकेट में भारत का प्रतिनिधित्‍व कर सके। इसके बाद तो श्रीसंत ने 2007 में पहले टी-20 विश्‍व कप में न सिर्फ भारत का प्रतिनिधित्‍व किया, बल्कि भारत को विश्‍व विजेता बनाने में भी अहम योगदान दिया।

श्रीसंत ने बिग बॉस में शेयर की यह घटना
श्रीसंत ने 2004 की घटना याद करते हुए बताया। उस साल केरल की रणजी टीम में भी उनका चयन नहीं हुआ था। यह तब की बात है, जब एक मैच खेलने के एक हजार रुपए मिलते थे। साल में आम तौर पर एक प्‍लेयर के हिस्‍से में 15 मैच आते थे। यानी साल भर में उनकी कमाई मात्र 15 हजार रुपए होती थी। उस दौरान उनके पास कमरे का किराया देने के लिए भी पैसा नहीं था और मैं निराश हो गया था। कुछ समझ में नहीं आ रहा था क्‍या करूं, तब वह मुनफ पटेल ही थे, जो मेरी मदद को आगे बढ़े। उन्‍होंने मेरा हौसला भी बढ़ाया। अब आप समझ सकते हैं कि फरवरी 2004 से लेकर 2005 के सितंबर तक उनके पास कमरे का किराया देने के लिए भी पैसा नहीं था और इसके बाद अक्‍टूबर 2005 में उनके पास 25 लाख रुपए थे। बता दें कि अक्‍टूबर 2005 में पहली बार श्रीलंका दौरे के लिए उनका टीम इंडिया के वनडे टीम में चयन हुआ था।

संघर्ष के दिनों को किया याद
बिगबॉस में अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए श्रीसंत ने बताया कि जब वह स्कूल में थे, तब वह तैयार होकर सुबह साढ़े 4 बजे ग्राउंड पर प्रैक्टिस करने के लिए घर से निकल जाया करते थे। वह अपनी साइकिल चला कर प्रैक्टिस करने रोज करीब 16 किलोमीटर जाया करते थे। इसके बाद कपड़े बदल कर वहीं से स्कूल जाते और फिर स्‍कूल से छूटते ही साढ़े तीन बजे वापस मैदान पर हाजिर हो जाते। रात में स्व‍िमिंग पूल जाते और फिर 16 किमी साइकिल चलाकर घर। इसके बाद नियमित रूप से स्‍कूल का होमवर्क करते। उन्‍होंने अपना दुख बयान करते हुए कहा कि इतना संघर्ष करने के बावजूद टीम इंडिया में उनकी स्‍थायी जगह नहीं बनी।

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